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लालचौक पर तिरंगा न फैलायेँ भारतीय युवा – उमर अब्दुल्ला


क्या जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नही है या वह किसी इस्लामिक राष्ट्र का अंग है ! वहाँ के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बयान से तो यही लगता है । इतिहास की दृष्टि से देखे तो जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिँह ने उसका भारत मेँ विधिवत विलय किया था । लेकिन मोहनदास गांधी द्वारा आधुनिक भारतीय राजनीति मेँ बोये गये मुस्लिम तुष्टिकरण के बीज को जवाहरलाल नेहरु ने सीँचकर विशाल वट वृक्ष और भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर को भारत का सर दर्द बना दिया । जिसका फायदा अलगाववादी आतंकवादी, उमर अब्दुल्ला जैसी सोच के कट्टर स्वार्थी मुसलमान, भारत सरकार से सम्मान पाने वाली विश्व विख्यात देश की गद्दार लेखिका अरुन्धति राँय और हमारेँ अल्पसंख्यक हित चिन्तक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता उठाते है । (more…)

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चंद्रगुप्त और चाणक्य को वृद्धा की सीख


सम्राट चंद्रगुप्त एवं चाणक्य की वीरता एवं बुद्धिमता का लोहा सभी मानते है , चाणक्य की कुटनीति विश्व की सर्वश्रेष्ठ कुटनीति मानी जाती है , फिर भी एक बार उनसे गलती हो गई थी और जिसके फलस्वरूप उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था । दरअसल नन्द राज्य को जीतने के लिये उन लोगों ने सीधा पाटलीपुत्र पर ही हमला कर दिया था और इस कारण उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा और मारे – मारे जंगलों में भी भटकना पड़ा था ।
इसी प्रकार जब वो भूखे – प्यासे एक दिन जंगल में भटक रहे थे तो उन्हें एक झोपड़ी दिखी । झोपड़ी के पास पहुँच कर जब उन्होंने आवाज दी तो अंदर से एक वृद्धा निकली । वह अत्यंत ही गरीब थी परन्तु उसका हृदय अत्यंत विशाल एवं प्रेम से परिपूर्ण था । (more…)

आचार्य कृपलानी और उनकी जाति ?


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रेल यात्रा कर रहे एक तिलकधारी सेठजी ने जब अपना भोजन का डिब्बा खोलना चाहा तो पास ही बैठे खद्दरधारी नेता को देख उन्हें शंका हुई । उन्होंने पूछा , ‘ नेताजी , आप किस जाति के है ? ‘
‘ जाति न पूछो साधू की , पूछ लीजिए ज्ञान ‘ यह कहावत क्या आपने नहीं सुनी ? नेताजी ने प्रश्न किया । ‘ साधू से नहीं पूछेंगे , पर आप तो गेरूवे कपड़े नहीं पहने हो । खादी तो आज कल मेहतर से लेकर ब्रह्मण , बनिये सभी नेतागिरी चमकाने के लिए पहनते है । ‘ सेठजी ने उत्तर दिया ।
‘ नहीं सेठजी , जाति बताने या छुपाने से कुछ नहीं होता ‘, यह कह कर नेताजी समाचार पत्र पढ़ने लगे । फिर भी सेठजी का आग्रह पूर्ववत् जारी रहा । अन्त में कुछ सोच कर नेताजी बोले , ‘ किसी एक जाति का होऊँ तो बताऊँ । ‘
सेठजी ने व्यंग्य किया , ‘ तो फिर क्या आप वर्ण – संकर है ? लगता है आपके पिताजी ने किसी दूसरी जाति की लड़की से विवाह किया था । ‘ (more…)

भारत के लिए घातक है आतंकवादियों के प्रति छद्म सैक्युलरवादी शक्तियां का समर्थन !!!


A Palestinian militant holds up a rifle during an anti-Israel rally in the northern Gaza Strip

अभी अधिक समय नहीं हुआ जब पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत के चक कस्बे में हिन्दू चिकित्सक डॉ. अजीत और उनके दो परिजनों नरेश व अशोक कुमार की हत्या कर दी गई। हमले में एक अन्य चिकित्सक डॉ. सत्यपाल गंभीर रूप से घायल हुए है। अंतर्राष्ट्रीय दबाव में प्रशासन ने दोषियों के खिलाप जो भी कार्रवाही की, उसका पाकिस्तान की जनता ने हड़ताल और विरोध प्रदर्शनों द्वारा भारी विरोध किया। असुरक्षा के वातावरण में कुछ अल्पसंख्यक हिन्दू पर्यटक वीजा पर पाकिस्तान से भागकर भारत में आ गये। भारत में फिलस्तीनी नागरिकों के अधिकारों और कश्मीर के अलगाववादियों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर आने वाले मानवाधिकारी और छद्म सैक्युलर बुद्धिजीवी पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न पर खामोश क्यों हैं? (more…)

भारत के छद्म सेक्यूलर नेताओं द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने का भयानक षडयन्त्र ! भाग – दो


 

Read Part 1 भारत के छद्म सेक्यूलर नेताओं द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने का भयानक षडयन्त्र !

लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान कहते है कि असली प्रजातंत्र हम जब समझेगें जब देश का प्रधानमंत्री मुसलमान होगा। हैदराबाद का एक विधायक मौलाना ओवैसी दुर्गा मंदिर में बजने वाले घण्टे को गैर इस्लामी बताकर प्रतिबंधित कराने का प्रयास करता है, तो बरेली की खचाखच भरी एक चुनावी सभा में एक मौलवी सार्वजनिक रूप से कहता है कि शहजिल इस्लाम (प्रत्यासी) को वोट देकर इतना मजबूत कर दो कि वो गैर मुस्लिम का सिर कलम कर सके। चुनाव जितने पर विधायक शहजिल इस्लाम ओसामा बिन लादेन को आतंकी नहीं जेहादी बताता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस प्रकार पहले तलवार के बल पर कत्ले आम मचाकर नंगा नाच होता था, मतांतरण कराया जाता था, कच्चे चमड़े के बोरों में जीवित लोगों को ठूँस – ठूँस भरकर सीलकर तडफते हुये मरने के लिये डाल दिया जाता था, नारियों का शील भंग किया जाता था, इन जेहादियों के आतंक से कन्याओं की भ्रुण हत्या कर दी जाती थी तथा नारियाँ सामूहिक रूप से एकत्र होकर अग्नि में प्राण गवाँ देती थी, जैसे मुगलकाल में हिन्दुओं के लिए नियम अलग और मुसलमानों के लिए अलग थे आज भी वो प्रक्रिया जारी है । (more…)

भारत के छद्म सेक्यूलर नेताओं द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर भारत को नष्ट करने का भयानक षडयन्त्र !


प्रिय राष्ट्र प्रेमियों –
एक वो समय था जब गाय माँ की रक्षा के लिये 1857 ईश्वी में क्रांति हो गई थी और हमारे पूर्वजों ने 4 लाख गद्दारों व अंग्रेजों को काट डाला था, ओर एक समय ये है जब 3500 हजार कत्लखानों में रोज माँ को काटा जा रहा है और हम तथाकथित अहिंसा व सेक्यूलरिज्म की आड़ में नपुंसकता की चादर ओढ़े घरों में दुबके बैठे है। एक प्रदेश की मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से ‘गौ मांस खाना मेरा मौलिक अधिकार है’ कहने का दुश्साहस करती है, किन्तु देश में उसके खिलाप कोई सशक्त प्रतिक्रिया नहीं आती, कारण भारत के नेतृत्व का भारतीयता विरोधी छद्म सेक्यूलरों के हाथों में होना, इनके द्वारा नित्य प्रति भारत के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने के कुचक्र रचे जा रहे है। देश की सीमाओं, संस्कृति, पुरातन धरोहर, हमारी शिक्षा पद्धति, हमारे मंदिर, साधु – सन्यासी, हमारी परंपराओं एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान पर सदैव सुनियोजित रीति से बहु – आयामी आक्रमण किये जा रहे है। हमारा देश छद्म सेक्यूलर नेताओं के कारण भीषण संकट के दौर से गुजर रहा है।
भारत में छद्म सेक्यूलरिज्म की संगठित शुरूआत 20 अगस्त 1920 को मोहनदास गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन के नाम से खिलापत आंदोलन (अरबपंथी कट्टर जेहादियों द्वारा तुर्की के खलीपा के समर्थन में चलाया गया एक विशुद्ध साम्प्रदायिक आंदोलन, जिसका भारत या भारत के मुसलमानों से कोई संबंध नहीं था।) को अपना नेतृत्व प्रदान करने से हुई। गांधी के शब्दों में – मुसलमानों के लिए स्वराज्य का अर्थ है – जो होना ही चाहिए खिलापत की समस्या के लिए भारत की क्षमता का, प्रभाव पूर्ण व्यवहार, इस दृष्टिकोण के साथ सहानुभूति न रखना एकदम असंभव है, खिलापत आंदोलन की पूर्ति के लिए आवश्यक लगने पर मैं स्वराज प्राप्ति की कार्यवाही को सहर्ष स्थगित करने के लिए आग्रह कर दूंगा। (more…)

अल्लाह बनाम तारी बनाम ईश्वर


इस्लाम का प्रारम्भ राष्ट्रीयता को अमान्य करते हुए हुआ । उनके लिए राष्ट्रीयता नाम की कोई चीज नहीं है । दुनिया भर के सारे मुसलमान जो एक राष्ट्र बनाते हैं , उसको मिल्लत कहते हैं । इस्लामिक अरब की साम्राज्यवादी नीति के अनुसार सब एक मिल्लत हैं एक राष्ट्र हैं , लेकिन हो नहीं सका । इस्लाम जब विभिन्न देशों में गया , तो राष्ट्रीयता के आधार पर बट गया । अरबिस्तान से तुर्किस्तान में पहुँचा , तो तुर्किस्तान की राष्ट्रीयता ने नया रूप ले लिया । 1918 में जब खलीपा को गद्दी से उतार कर मुस्तफा कमाल पाशा वहाँ का प्रमुख बन गया , तो उसने सारे मुल्ला – मौलवियों को बुलाकर कहा – ” कौन सी भाषा में नमाज पढ़ते हो ? ” उन्होंने कहा ‘ हम अरबी में पढ़ते हैं ‘ ” अरबी में क्यों ? क्या भगवान को तुर्की भाषा समझ में नहीं आती ? खबरदार ! अब अरबी भाषा में नमाज नहीं पढ़ोगे और अल्लाह नहीं कहोगे । अल्लाह अरबी शब्द है , तुर्की का शब्द है तारी , सबको तारी कहना पड़ेगा । ”

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बाबर की मजार बनाम बाबरी मस्जिद


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जब इस्लाम अफगानिस्तान में पहुँचा , तो अफगानिस्तान के लोग अरब साम्राज्यवादी शक्तियों द्वार छल – प्रपंच से किये गये युद्ध में हार गये । लेकिन उन्होंने अपने पूर्वजों को विस्मृत नहीं किया था । आज जो अफगानिस्तान में तालिबान है , सारे बुद्ध की प्रतिमा तोड़ रहे हैं , ये तालिबान तो वैश्विक अरब साम्राज्यवादी मानसिकता और पाकिस्तान से प्रशिक्षित होकर कट्टरपंथी बन गये हैं । वहां के अफगानों में इतने दिनों तक यह नहीं था । लेकिन वहाँ का अफगान क्या सोचता है ? मोहनदास गांधी की पुत्रवधु ( मोहनदास गांधी के दत्तकपुत्र फिरोज खान गांधी की पत्नी । ) श्रीमती इन्दिरा गांधी जब अफगानिस्तान गयी , तो वहाँ पर उनको लगा कि यहाँ बाबर की मजार है । उन्होंने कहा कि इतना बड़ा सम्राट हुआ , साम्राज्य संस्थापक हुआ , चलो उसकी मजार पर पुष्प चक्र चढ़ाना चाहिए । उन्होंने कहा , मैं बाबर की मजार पर पुष्प चढ़ाना चाहती हूँ । अफगानिस्तान की सरकार बड़ी घबरायी , कभी सोचा भी नहीं था , कोई आकर पुष्प चक्र चढ़ायेगा । पता लगाया , तो एक कब्रिस्तान में एक कोने में उसकी मजार थी । इतनी टूटी – फूटी अवस्था में थी , कि झाड़ – झंखाड़ खड़े हो गये थे । भारत की प्रधानमंत्री आने वाली हैं , इसलिए उन्होंने उसे साफ करके देखने लायक बनाया । प्रधानमंत्री गयी , वही पुष्प चक्र चढ़ाया । जब जाने लगी तो उनके साथ एक अधिकारी था , उसने वहाँ के कब्रिस्तान के प्रमुख से पूछा , बाबर इतने बड़े एक साम्राज्य का संस्थापक हुआ और उसकी मजार इतनी टूटी फूटी अवस्था में ? तो उसका उत्तर था – वह कौन अफगान था ! वह अफगान नहीं था , तो हम उसकी चिन्ता क्यों करें ? अफगानिस्तान का मुसलमान , मुसलमान होते हुए भी बाबर को अपना नहीं समझता । दुर्भाग्य की बात है कि अपने देश भारत में मुसलमानों का एक वर्ग बाबर को अपना पुरखा मानता है और उनके वोटों के लालची राजनीतिज्ञ भी बाबर को अपना पुरखा मानते हैं , इसलिये उसने राम मन्दिर तोड़कर वहाँ पर जो मस्जिदरूपी ढ़ाँचा बनाया था , उसको बाबरी मस्जिद कहते है ।

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नेहरू ने नेताजी को ब्रिटेन का युद्ध अपराधी कहा था !

वैदिक दण्ड विधान और लोकपाल विधेयक


वेद के अनुसार जिस गलती को एक आम आदमी करता है और उसी गलती को प्रथम श्रेणी का आदमी करता है, तो आम आदमी के मुकाबले पर प्रथम श्रेणी के आदमी को आठ गुणा दण्ड अधिक मिलना चाहिये । जैसे जिस समय द्वापर काल ( अब से लगभग 5200 वर्ष पूर्ण ) में युवराज युधिष्ठिर व युवराज दुर्योधन में से राजा चुनने हेतु पात्रता परीक्षा का आयोजन हुआ, तो प्रश्न रखा गया था कि चार मानव है, उनमें एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, एक वैश्य और एक शुद्र है । उन्होंने एक निअपराध मानव की हत्या कर दी है, तो उनको दण्ड देने की प्रक्रिया किस प्रकार की जाये । इसके उत्तर हेतु सर्वप्रथम दुर्योधन को आमंत्रित किया गया । दुर्योधन ने उत्तर में कहाँ कि चारों को समान रूप में दण्ड दिया जाये । फिर युधिष्ठिर को आमंत्रित किया गया, तो वैदिक दण्ड विधान को जानने वाले युधिष्ठिर ने अपने उत्तर में कहाँ कि इन चारो अपराधियों में से शुद्र को चार वर्ष का दण्ड देना चाहिये, क्योंकि इसका ज्ञान कम है । फिर वैश्य के प्रति कहाँ कि यह शुद्र से अधिक ज्ञानवान है तथा व्यापार, कृषि व पशु पालन में कुशल है, इसको आठ वर्ष का दण्ड देना चाहिये । फिर क्रम क्षत्रिय का आता है, इसमें युधिष्ठिर ने कहाँ कि क्षत्रिय पर जनता की रक्षा का दायित्व होता हैँ, इसने अपने दायित्व का उलंघन कर अनुचित कदम उठाया है, इसलिये इसको सौलह वर्ष का दण्ड देना चाहिये । फिर क्रम ब्राह्मण का आता है, इसमें युधिष्ठिर ने कहा कि ब्राह्मण का कार्य सर्व समाज को शिक्षा देना हैँ, ब्राह्मण गुरू होता है और जैसा गुरू होता है, वैसा ही शिष्य अर्थात समाज बनता हैं । अतः इस ब्राह्मण को बत्तीस वर्ष का दण्ड देना चाहिये । इसी प्रकार मंत्री को सहस्र गुणा और राजा को सबसे अधिक दण्ड देना चाहिये ।
इसी प्रकार लोकपाल में दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिये । चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को प्रारंभिक दण्ड दिया जाना चाहिये तथा प्रथम श्रेणी के कर्मचारीयों ( आईँ ए. एस. व राजनेताओं आदि ) को अधिक दण्ड दिया जाना चाहिये । जो जितने महत्वपूर्ण पद पर है, उसको उतना अधिक दण्ड दिना चाहिये । वर्तमान भारत में प्रधानमंत्री की राजा के समान सर्वोच्च मान्यता है, अगर वो कोई गलत कार्य करता है तो वो सबसे अधिक दण्ड पाने का अधिकारी है । क्योंकि कहा गया है, कि यथा राजा तथैव प्रजा । इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री को स्वयं लोकपाल विधेयक के दायरे में आना स्वीकार कर लेना चाहिये ।

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कब तक रहेगा – इंडिया, दैट इज भारत


किसी भारतीय भाषी से हमारे देश का नाम पूछिये तो वह कहेगा – भारत , मैं भी कहूंगा – भारत , लेकिन किसी अंग्रेजीदां से पूछ कर देखिए, वह कहेगा – इंडिया, लेकिन क्या किसी देश के दो – दो नाम होते है ? अमेरिका के कितने नाम है ? और ब्रिटेन के ? क्या श्रीलंका का कोई अंग्रेजी नाम भी है ? स्वाधीनता से पूर्व श्रीलंका को ‘ सीलोन ‘ तथा म्यांमार को ‘ बर्मा ‘ के नाम से जाना जाता था, लेकिन जब उनमें राष्ट्रीयता का बोध जागा, तो उन्होंने अपना नाम बदल लिया, आज उन्हें उनके पूर्व नामों से कोई नहीं जानता है, न लिखता है और न बोलता है और अब सारी दुनियां उन्हें श्रीलंका और म्यांमार के नाम से जानती है । यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम अभी भी दो – दो नाम ढो रहे है , हम अपने को भारत मानते है, लेकिन दुनियां हमें इंडिया कहती है । और भारत सरकार आज भी अपने को गवर्नमेंट ऑफ इंडिया लिखती है ।
ब्रिटिश शासकों के चंगुल से तो ‘ इंडिया ‘ मुक्त हो गया किन्तु तब तक यह आर्यावर्त तो किसी तरह रह ही नहीं गया था, भारतवर्ष अथवा हिन्दुस्थान भी नहीं बन पाया । क्योंकि सत्ता हस्तांतरण के समय हमारे स्वदेशी शासन का सूत्र संचालन जिन तथाकथित कर्णधारों ने येन – केन – प्रकारेण अपने हाथों में लिया वे भारतीय संस्कृति, भाषा, साहित्य, धर्म, दर्शन व परंपरा, विज्ञान, इतिहास और जीवनमूल्यों के प्रति हीन भावना की मनोग्रन्थि से ग्रस्त थे, वे केवल नाम और शरीर से भारतीय थे । उन्होंने एक ऐसे समाज के निर्माण की नीव डाली जो भारतीयता से शून्य थी और इस देश को इंडिया, दैट इज भारत बना दिया । पिछले पैंसठ वर्षो में उसमें से भी भारत तो लुप्त ही होता जा रहा है, क्योंकि इंडिया उसको पूर्ण रूप से निगलता जा रहा है । शकों, हूणों, तुर्को, मुगलों, अरबों, अफगानों के बर्बर जेहादी आक्रमण और शासन जिसका स्वरूप विकृत नहीं कर सके, उसे केवल दो – सौ वर्षो की ब्रिटिश शासकों की कुसंगति और शिक्षा पद्धति ने आपाद – मस्तक रूपांतरित कर दिया ।
स्वतंत्रा प्राप्ति से पूर्व जो युवा पीढ़ी देश में थी उसकी सारी शक्ति संचित रूप से एक महान लक्ष्य को समर्पित थी । वह लक्ष्य था – पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ कर देश को विदेशियों की दासता से मुक्त करना । अपनी सारी शक्ति से वह पीढ़ी अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये दृढ़ संकल्प थी और अंततः वह सफल भी हो गई । किन्तु विडम्बना यह है कि युवा पीढ़ी के उस बलिदान का श्रेय तत्कालीन स्वार्थान्ध किन्तु चतुर नेताओं ने अपनी झोली में समेट कर पूरी पीढ़ी को घोर चाटुकारिता नपुंसकता के पर्यायवाची गीत ‘ दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल ‘ की लय पर नचा दिया । न केवल इतना अपितु तिल – तिल कर अपने प्राणों की आहुति देने वाले महाराणा प्रताप, क्षत्रपति शिवाजी, गुरू गोविन्द सिंह, गोकुल सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, पं. नाथूराम गोडसे, मदन लाल ढिंगरा, वीर सावरकर जैसे वीरों की नितांत अवहेलना कर उन्हें लांक्षित किया ।
स्वाधीना प्राप्ति से पूर्व और पश्चात की स्थिति का विश्लेषण करने पर जो दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य प्रकट होता है वह यह है कि पहले तो अभारतीय अर्थात अहिन्दू ही भारत तथा भारतीयता को नष्ट करने में संलग्न थे, किन्तु आज भारतीय और हिन्दुओं के द्वारा ही भारतीयता तथा हिन्दुत्व को नष्ट करने का कार्य किया जा रहा है । भारतीय जीवन पद्धति के सोलह संस्कारों में से अधिकांश तो भुला दिये गए हैं, शेष भी शीघ्र भुला दिये जाने की स्थिति में है । विवाह जैसे महत्वपूर्ण संस्कार पंजीयक के कार्यालय में सम्पन्न होने लगे हैं । वैदिक विधि से सम्पन्न होने वाले विवाहों में भी केवल परिपाटी का ही परिचलन किया जाने लगा है । जन्मदिन तो बहुत पहले से ही ‘ बर्थ – डे ‘ के रंग में रंग गए है, जिनकी जीवन – ज्योति को जलाया नहीं बल्कि बुझाया जाता है । पारिवारिक संबोधन और संबंध मम्मी – डैडी, आंटी – अंकल, मदर – फादर, कजन – बर्दर आदि में परिवर्तित हो गए है । सामाजिक समारोह, संस्कारों आदि के अवसर पर निमंत्रण पत्रों को संस्कृत, हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में मुद्रित कराना उनकी दृष्टि में स्वयं को पिछड़ा सिद्ध करना है ।
सत्तालोलुप अधिकांश नेता सत्ता हस्तांतरित होते ही देश प्रेम को भुल कर जो कुछ त्याग – तप करने का नाटक उन्होंने किया था, उससे सहस्र गुणा अधिक समेटने के लिए आतुर हो उठे । उभरती हुई युवा पीढ़ी और देश के पुर्निर्माण की बात भूल कर वे अपने निर्माण में जुट गए । पाश्चात्य सभ्यता में आकण्ठ डूबे होने के कारण वे अपने तुच्छ स्वार्थो की पूर्ति और तुष्टि के लिये उन्होंने भावी भारत की निर्मात्री पीढ़ी के भविष्य के साथ – साथ देश के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया ।
ऐसी स्थिति में अब वर्तमान पीढ़ी को ही भारत को इंडिया के चंगुल से मुक्त कर उसे पुन विश्व की महाशक्ति बनाने व जगद्गुरू पद पर प्रतिष्ठित करने का दायित्व लेना होगा । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये भारतीय शिक्षा प्रणाली को पुर्नजीवित करना होगा । संविधान में संसोधन करा इंडिया शब्द की बजाय भारत का प्रावधान कराना होगा तथा देश की किशोर व युवा पीढ़ी को राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के साथ जोड़ना होगा ।

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