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राजद्रोही शंकराचार्य स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ जी

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सन् 1924 में ब्रिटेन के युवराज प्रिंस ऑफ वेल्स भारत आए थे तो भारत की आम जनता ने उनके भारत आगमन का बहिष्कार कर दिया । ब्रिटिश सरकार परेशान हो गई क्योंकि वो चाहती थी कि भारत की जनता श्रद्धा – भक्ति के साथ युवराज का आदर – सम्मान करे । ब्रिटिस सरकार यह भली – भाति जानती थी कि भारत की धर्मपरायण जनता अपने धर्माचार्यो के आदेशों का पालन करने को हमेशा तत्पर रहती है, अतः ब्रिटिश सरकार की ओर से पत्र द्वारा पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ जी से अनुरोध किया गया कि वह राजा को भगवान विष्णु का प्रतिनिधि मानने के हिन्दू धर्म के सिद्धांत के अनुसार राजकुमार वेल्स को सम्मान देने का आदेश अपने अनुयायियों को दें । शंकराचार्य जी ने पत्र पढ़ा तथा निर्भय होकर उत्तर दिया, ‘ अंग्रेज विदेशी लुटेरे हैं । वे प्रजा – पालक नहीं हैं । जिन्होंने हमारी मातृभूमि को छल – कपट से गुलाम बना रखा हैं, उन्हें विष्णु का प्रतिनिधि कैसे घोषित किया जा सकता है ? ‘ साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन उनके उत्तर से क्रोधित हो गया । पूज्य शंकराचार्य जी को कारागार में बंद करके उन पर राजद्रोह का अभियोग चलाया गया लेकिन शंकराचार्य जी अपनी राष्ट्रभक्ति कर अडिग रहे ।

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